जाति कभी नहीं जाती

 जाति कभी नहीं जाती

हर इंसान हर रोज़ कुचला जाता है,

जन्म की मिट्टी में ही शर्म और तिरस्कार रच दिया जाता है।


कदम-कदम पर दीवारें चुभती हैं,

हर आवाज़ को खंडहर बना दिया जाता है,

सपनों को रेत की तरह उड़ा दिया जाता है,

हक़ मांगना भी गुनाह बन जाता है।


छूआछूत की परछाई छाती तक उतर आती है,

हिम्मत की हर किरण कुचल दी जाती है,

इंसानियत सिर्फ़ सूनी किताबों में रह जाती है।


हर रोज़ घुटन में जीते हुए

इंसान को छोटा कर दिया जाता है,

दर्द… दर्द खून बनकर उतर आता है,

और पीढ़ियाँ वही जलता हुआ दर्द पीती रहती हैं।


.… राहुल 

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