मैं उसकी नापसंद में भी
ख़ुद को खुशनसीब मान लेता हूँ,
वो जिस तरह चाहे
मुझे अपनी ज़िंदगी में रख लेता है।
अब इस पीड़ा से कोई गिला नहीं रहा,
ये दर्द ही मेरी आदत बन चुका है मगर—
काश, वो एक बार
झूठ ही सही, मुझे अपना कह दे।
उस एक झूठ पर भी
मैं उसे अपना ख़ुदा मान लूँ,
मुझे शौहरत की कभी आदत नहीं रही,
मेरी क़ीमत तो तब बढ़ती है
जब मैं
अपने ख़ुदा के क़दमों में
पड़ा रहूँ।
राहुल
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